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मेरा बोझ

 उजड़ती ज़िन्दगी, बिखरती तमन्नाएं। समेटू कहां। ये प्रश्न ही है जिसका बोझ उतारने को,  भटकता हूं यहां वहां। वो स्थल है कहां जहां मै विश्राम करू कर्महीन होकर भी कर्महीन ना कहलाऊं, ऐसा जीवन हैं कहा। अभी तो युवान हूं, तब भी कदम डगमगा जाते, सहारा लेने जाऊ कहां। सोचता हूं, हवाओ में बहता जाऊ, बिन पंख उड़ जाऊ, दूर गगन से देख इस धरा को, मैं भी मुस्कुराऊ। पर बंधन है की छोड़ता ही नहीं, पूछता है तू जाता कहां, छोड़ मुझे खुद उड़ना चाहता हैं। जड़ हो जा यही, जैसे वट वृक्ष कोई, तानो को अपने कठोर कर, लताओं को विस्तार दे, फिर बोझ लगेगा कहां, ये तो कर्तव्य हैं तेरा, इसका निर्वाह ही धर्म तेरा। आदेश हैं या विनती, उसकी सुनूं या अपनी, मैं हो भी जाऊ ऐसा, परंतु कठोरता मेरा व्यवहार नहीं, विस्तार की आस नहीं, खुद मैं ही सिमटने की आतुरता है, बस एक बार, सब कुछ छोड़ उड़ जाने की हैं।

अकेला चल

यदि कोई तुझ से कुछ न कहे, तुझे भाग्यहीन समझकर सब तुझसे मुंह फेर ले और सब तुझसे डरे, तो भी तू अपने हृदय से अपना मुंह खोलकर अपनी बात कहता चल। अगर तुझसे सब विमुख हो जाए, यदि गहन पथ प्रस्थान के समय कोई तेरी ओर फिर कर भी ना देखे, तब पथ के कांटों को अपने लहू लुहान पैरो से दलता हुआ अकेला चल। यदि प्रकाश न हो, झंझावात और मूसलाधार वर्षा की अंधेरी रात में जब अपने घर के दरवाजे भी तेरे लिए लोगो ने बंद कर लिए हो, तब उस वज्रानल में अपने वक्ष के पिंजर को जलाकर उस प्रकाश में अकेला ही चलता रह। ये गीत "कवींद्र रवीन्द्र" ने लिखा है।

मन का संघर्ष

दुखी है मन, जाने ना, घायल है अंजान के बाणों का, कराह रहा है अंधेरे में, रोशनी उसको कोई दिखाए ना। सिसक रहा सोच कर, कोई सुन ना ले आहट, पीड़ा ना बना दे पात्र उपहास का, क्या यही है कारण उसकी उदासीनता का। परन्तु साहसी है वह घायल, जो देता है स्वयं, मन को दिलासा, और ईश्वर से कहता है, तेरी इस नियति को भी स्वीकारा हैं। वो प्रयास करता बार बार, हो जाय उजाला कहीं इस अंधेरे में, परन्तु बुझा दिए दीपक उम्मीदों के, नियति ने फूंक से। अपनाया परिश्रम को, नियति को त्याग दिया, बोझ उठा कर सभी दुखो का, उसने अंधेरे को त्याग दिया, संघर्ष मान कर भाग्य का, मोक्ष पाने चल दिया।

भाग्य

निराशाओं के बादल ने घेरा है मुझको, पनघट ने प्यासा भेजा है मुझको, सामर्थ्य भी अपना व्यर्थ लगता है, जब भाग्य झुका देता हैं मुझको। सबके संघर्ष की व्याख्या अलग है, सबके कष्टों का भार अलग है, जब दुनिया में चमत्कार होते हैं, तो भाग्य कर्मो पर निर्भर क्यों है? यदि कर्म करना ही छोड़ दिया, तो भाग्य क्या चमत्कार दिखाएगा, कर्मो ने ही हमें अद्वितीय बनाया, अन्यथा ईश्वर ने तो एक सा बनाया।

अकेला मन

कोसा नहीं कभी भाग्य को, अपनी गलती को स्वीकारा है, दुख है मन में उसके, क्योंकि गलतियों को आदत बना डाला है, तब ही दुख के अंधियारे में, ये मन अकेला है। कभी दुख को किसी से बांटा नहीं, कभी उस दुख का कारण खोजा नहीं, समझ के गलती खुद की, दुख को पाला हैं, तब ही दुख के अंधियारे में, ये मन अकेला है। परिश्रम कभी करना चाहा नहीं, आलस्य को भी कभी त्यागा नहीं, सदा खुद पर निराशा का साया डाला है, तब ही दुख के अंधियारे में, ये मन अकेला है।

समय

समय जीवन की एक बहुमूल्य वस्तु, जिसका सदुपयोग लगभग कुछ ही मनुष्य जान पाते है जो जान पाते है उनको समय कभी भूलने नहीं देता। समय एक निरंतरता है जो आवश्यक है प्रकृति के लिए। तो कितना जाना है हमने समय को? हम कभी इसकी गति से नहीं चलना चाहते है,शायद यही कारण हो कि हम इसके महत्व को समझ ही नहीं पाते। लेकिन समय आज जिस रफ्तार से चल रहा है अर्थात आज के समय में समाज में, प्रकृति में जिस गति से परिवर्तन आ रहा है वह प्रशंसनीय भी है और चिंताजनक भी। जहां हम समय की धारा में बहकर आधुनिकता की ओर बढ़ रहे है, वहीं दूसरी ओर हम अपने नैतिक मूल्यों को भी भूलते और छोड़ते जा रहे है। ये आवश्यक हैं कि यदि आगे बढ़ना है तो हमें समय के इस बहाव के साथ समाज और प्रकृति में आए परिवर्तनों को स्वीकारना होगा, किन्तु अपने नैतिक मूल्यों के आधार को छोड़ना कहां तक उचित है। ये एक विचारणीय विषय है जिसकी हमें समीक्षा करनी चाहिए।

अनमोल रत्न

अनमोल रत्न में भूल गया, किसी अंजान की कुटिया में, शायद उनका महत्व ही भूल गया, समय के इस बहाव में। संजोकर रखना था उन रत्नों को, मंजिल तक पहुंचने में, परन्तु कष्ट समझकर भार उनका, बिखेरता ही चला गया मैं। यात्रा के इस पड़ाव में, व्यर्थ लगता है सफर, उन रत्नों को पाकर, काश वापस ला पाता, उन रत्नों को पीछे जाकर। परन्तु समय के इस बहाव ने, कभी अपनी दिशा नहीं बदली, मात्र किसी की सोच पर।